गोकुल में कृष्ण जन्म से पहले छठी:लाला की छीछी की एक बूंद के लिए उमड़ते भक्त

वैसे तो पंथ सीरीज हर शुक्रवार को आप पढ़ते हैं। इस बार एक दिन पहले यानी आज पढ़ें, क्योंकि जन्माष्टमी के मौके पर हम खास आपके लिए गोकुलधाम पहुंचे हैं।
कैसा दिखता है आज का गोकुल, कैसे हैं गोकुलवासी और कैसे मनाते हैं यहां जन्माष्टमी। यह सब सोचकर ही मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही है।
मथुरा से 10-12 किलोमीटर की दूरी पर है गोकुल। यहां पहुंचने पर ऐसा लग रहा है कि जैसे हर किसी के कदम गोकुल की ओर बढ़ रहे हैं। सूरज की तपिश कुछ कम हुई है। ऐसे में पैदल चलना थोड़ा आसान लग रहा है।
जिस तरफ देखो लोगों के सिर पर बैग-बस्ते लदे हैं। पीले कपड़ों में वह गली-गली राधे-राधे कहते हुए बस मंजिल की ओर बढ़ते जा रहे हैं।
जन्माष्टमी वैसे तो पूरे देश में धूमधाम से मनाई जाती है, लेकिन गोकुल का नजारा थोड़ा अलग है। लगभग 5000 साल पहले द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने अपने बचपन के 11 साल एक महीना इसी जगह पर बिताए थे।
कहते हैं कि श्री कृष्ण ने ठुमक-ठुमक कर चलना यहीं सीखा था। माखन मिश्री भी यहीं चुराया और गाय भी यहीं चराई थी। गोकुल के ही घाट पर उन्होंने बाल लीलाएं की हैं।
